मंदिरों की नगरी के नाम से विख्यात बटेश्वर आगरा से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जो यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि ‘बटेश्वर’ नाम वटेश्वरनाथजी के नाम पर पड़ा है। भगवान शिव के अनेक नामों में से उनका एक नाम यह भी है। वह इस तीर्थनगरी के इष्टदेव हैं। ऐसी मान्यता है कि यह भगवान कृष्ण की माता देवकी की जन्मस्थली भी रहा है। वह भगवान कृष्ण के नाना राजा सूरजसेन की बेटी थीं, ऐसा कहा जाता है कि वह इस शहर के संस्थापक थे और इसका मूलनाम सूरजपुर था।

बटेश्वर हिंदू तीर्थ स्थलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यह ‘धामों का पुत्र’ भी कहलाता है। इसका अर्थ है कि हिंदुओं में पवित्र माने जाने वाले चार धामों (बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारका एवं पुरी) के पश्चात यहां अवश्यक जाना चाहिए। यहां अनेक मंदिर स्थित हैं, कभी इनकी संख्या 101 हुआ करती थी। वर्तमान में उनमें से केवल 42 मंदिर सही हालत में हैं। इस शहर का उल्लेख रामायण, महाभारत, मत्स्य पुराण आदि में भी किया गया है। घाटों की लंबी कतार पर स्थित अनेक मंदिरों के कारण यह शहर न केवल देखने में आकर्षक लगता है अपितु आध्यात्मिक संतोष भी प्रदान करता है। 

आध्यात्मिक महत्व के अलावा यहां स्थित मंदिर प्राचीन वास्तुकला के नायाब उदाहरण हैं। पर्यटक इन्हें देखकर अभिभूत रह जाते हैं। सब्ज़ियों द्वारा बनाए गए पारंपरिक रंगों से बने सुंदर भित्तिचित्र दर्शकों को आकर्षित करने में हमेशा ही सफल रहे हैं। 

जैन समुदाय के लोगों में भी बटेश्वर की बहुत मान्यता है। जैसा कि किंवदंती है कि 22वें जैन तीर्थंकर नेमीचंद का जन्म यहीं पर हुआ था। इस कारण से यह शहर जैनियों के दोनों मतोंः श्वेताम्बर एवं दिगम्बर के लिए अहम तीर्थस्थल है। विभिन्न प्रकार की सुंदर नक्काशी वाले ये मंदिर तीर्थंकर तथा यहां से तीन किलोमीटर दूर स्थित शोरीपुर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

बटेश्वर यहां होने वाले वार्षिक पशु मेले के लिए भी प्रसिद्ध है जो पिछले 400 वर्षों से आयोजित किया जा रहा है। हर साल बदलती तिथि के साथ शहर में लगने वाला यह मेला शुभ अवधि के साथ मेल करते हुए आयोजित होता है जो संतों, कारोबारियों के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों के लिए भी महत्वपूर्ण गंतव्य होता है। इस मेले में ऊंटों, बैलों, बकरियों एवं घोड़ों के अतिरिक्त स्थानीय फर्नीचर, मसालों तथा खाना बनाने वाले पारंपरिक बर्तनों की बिक्री होती है। यह मेला वास्तविक रूप में ग्रामीण भारतीय जीवन का प्रामाणिक अनुभव प्रदान करता है। उत्तर भारत में  होने वाले बड़े मेलों में अपने प्रकार का एक मेला है। यह मेला तीन सप्ताह तक चलता है तथा हर साल हज़ारों पर्यटक इसे देखने यहां आते हैं।      

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