बेतवा और पहूज नदी के बीच स्थित ऐतिहासिक शहर झांसी, जाना जाता है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथाओं के लिए। सन 1857 में जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन का पहला बिगुल बजा था, तब रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज हुकूमत के छक्के छुड़ा दिये थे। तब उनकी उम्र महज 22 वर्षी थी। लेकिन इतनी कम उम्र में भी अपनी परिपक्व सोच और सूझबूझ तथा बहादुरी के बल पर ही वह अंग्रेजों से लोहा ले पायीं और तब से आज तक न केवल झांसी में, बल्कि पूरे भारत में उनकी वीरता के किस्से सुनाए जाते हैं। यहां स्थित झांसी का किला और रानी महल, दो ऐसे सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जो इस तेजस्वनी रानी के बलियाद को आज भी बखूबी याद दिलाने का काम करते हैं। झांसी के किले में आयोजित किया जाने वाला ध्वनि एवं प्रकाश प्रदर्शन, एक ऐसा अनूठा शो है जो रानी लक्ष्मीबाई के जीवन को बेहद करीब से दर्शाता है। इसलिए झांसी आने वाले सैलानियों को यह शो जरूर देखना चाहिये। 

झांसी में प्राचीन किलों के अलावा बहुत से आध्यात्मिक स्थल और झीलें भी हैं, जिनका अलग-अलग शासकों द्वारा अपने-अपने शासन काल में करवाया गया था। इन स्थलों की खूबसूरती और भव्यता अतीत की याद दिलाती है तथा यहां आने वाले पर्यटकों को मानो इतिहास में वापस ले जाती है। नौवीं से तेहरवीं सदी तक झांसी पर चंदेलों का राज था और उस वक्त इस जगह को बलवंत नगर के नाम से जाना जाता था। फिर 11वीं सदी के आस-पास धीरे-धीरे यह शहर अपना महत्व खोने सा लगा। लेकिन जब 17वीं सदी में ओरछा के राजा बीर सिंह देओ ने झांसी पर अपनी हुकूमत कायम की तो झांसी का एक बार फिर से उदय होने लगा। झांसी का प्रसिद्ध किला राजा बीर सिंह द्वारा ही बनवाया गया है, जो कि एक पथरीली पहाडी़ पर स्थित है। फिर 18वीं सदी में यह शहर साम्राज्य की राजधानी बना और सन 1804 से 1853 के बीच झांसी का राजसी वैभव सामने आया। 

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