परागपुर

अमृतसर से करीब 167 किलोमीटर दूर एक शांत कस्बा परागपुर स्थित है जो हिमाचल प्रदेश में आता है। 1997 में इसे विरासत गांव घोषित किया गया। यह समुद्र तल से लगभग 1,800 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। पूरा गांव प्रसिद्ध जलकुंड ‘ताल’ के आसपास स्थित है। यद्यपि यह तालाब प्रकृति का एक अनूठा उपहार है, आगंतुक इसके निकट स्थित राधा-कृष्ण मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए भी आते हैं। यह मंदिर भगवान कृष्ण एवं देवी राधा को समर्पित है। इस जगह में विरासत की दृष्टि से महत्वपूर्ण अनेक इमारतें विद्यमान हैं। इनमें से कुछ इमारतें 100 साल पुरानी हैं, जिनमें बुटेल निवास तथा जज कोर्ट है, यह इंडो-यूरोपियन शैली में बना है।

यह कस्बा विभिन्न त्योहारों के लिए भी लोकप्रिय है जो बड़े उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। लोहड़ी इनमें से एक है, यह पर्व तब मनाया जाता है जब सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करता है। सितम्बर में कुश्ती महोत्सव भी होता है, जिसमें भी भीड़ उमड़ती है।  

गुरदासपुर

अमृतसर से करीब 75 किलोमीटर दूर स्थित गुरदासपुर की स्थापना गुरुजी महंत ने 17वीं सदी में की थी। व्यास व रावी नदियों से घिरे पंजाब का यह प्रमुख शहर राज्य का सबसे उत्तरी ज़िला है। इस शहर का ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्त्व भी है, ऐसा कहा जाता है कि मुग़ल शासक अकबर यहां पर भी सत्तारूढ़ थे। महान सिकंदर ने अपनी अनेक लड़ाइयों में से एक यहीं पर लड़ी थी। पर्यटक यहां से लगभग 30 किलोमीटर दूर बटाला भी जाते हैं, ऐसा माना जाता है कि यहां पर गुरु नानक का विवाह हुआ था। कंध साहिब गुरुद्वारा जहां विवाह समारोह संपन्न हुआ था, यहां का मुख्य आकर्षण है। बटाला में अकबर के सौतेले भाई शेर ख़ान का मकबरा भी है। यह मकबरा मुग़ल वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है तथा इसे देखने आसपास के क्षेत्र से लोग यहां आते हैं। बटाला के निकट कादियां स्थित है, जो अहमदिया समुदाय के संस्थापक मिर्ज़ा हादी बेग़ की जन्मस्थली रही है।

गुरदासपुर के अन्य आकर्षणों में महाराजा रणजीत सिंह के पुत्र महाराजा शेर सिंह द्वारा बनवाया गया महल तथा सैयद इमाम अली शाह का मकबरा भी है। गुरदासपुर में प्रमुख प्राकृतिक आर्द्रभूमि क्षेत्र केशोपुर भी स्थित है जो सर्दियों में मध्य एशिया एवं साइबेरिया के हज़ारों प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करता है। यहां दिखने वाली प्रसिद्ध प्रजातियों में विजियन बत्तख, डब चिक, काली इबिस, सोनुला बत्तख, बटवा तथा उत्तरी शोव्हेलर प्रमुख हैं।

गुरदासपुर

कपूरथला

पंजाब का यह शहर अपने यहां स्थित स्मारकों के शानदार वास्तुशिल्प एवं बागों के लिए लोकप्रिय है। ये इंडो-अरब एवं फ्रांसीसी शैली में बनाए गए हैं। इस शहर की स्थापना 11वीं सदी में जैसलमेर के राणा कपूर (जिनके नाम पर इस शहर का नाम पड़ा) ने की थी। 

कपूरथला का मुख्य आकर्षण जगतजीत पैलेस है जो तत्कालीन महाराजा का निवास स्थान हुआ करता था। इसका निर्माण 1908 में हुआ था, कइयों का मानना है कि यह फ्रांस के प्रसिद्ध वर्सेल्स पैलेस की तरह बनाया गया था। वर्तमान में, यह सैनिक स्कूल की देखरेख में है, जहां पर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के लिए लड़कों को प्रशिक्षण दिया जाता और तैयारी कराई जाती है। एलिसी पैलेस भी देखने लायक जगह है। इसकी अखंड संरचनाएं एवं सुंदर फसाड आंखों को बहुत भाते हैं। इसका निर्माण 1962 में कुंवर बिक्रम सिंह द्वारा इंडो-फ्रांसीसी वास्तुशैली में कराया गया था। मूरीश मस्जिद एवं पांच मंदिर भी ऐसे ही स्थल हैं जिन्हें अवश्य देखना चाहिए। फोटोग्राफी में रुचि रखने वाले लोग कांजली आर्द्रभूमि क्षेत्र का रुख कर सकते हैं, जहां पर बड़ी संख्या में स्तनधारी जंतु एवं पक्षी पाए जाते हैं। कांजली झील पिकनिक के लिए उपयुक्त जगह है, जिसके आसपास सुंदर परिदृश्य एवं अद्भुत परिवेश विद्यमान हैं। विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए पुष्पा गुजराल साइंस सिटी देखने लायक जगह है। इस शहर के निकट सुल्तानपुर लोधी आध्यात्मिक जगह है, जो सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक से संबंधित है।

कपूरथला

जालंधर

अमृतसर से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित जालंधर, व्यास व सतलुज नदियों के बीच स्थित मैदान पर बसा अतिव्यस्त शहर है। ‘जालंधर’ का अर्थ होता है वह स्थान जो पानी के भीतर स्थित हो। कइयों का मानना है कि इस शहर का यह नाम दो नदियों के बीच स्थित होने के कारण पड़ा। यह पंजाब के सबसे बड़े शहरों में से एक है, इसलिए यहां पर पर्यटकों के लिए सुअवसरों की कोई कमी नहीं है। इस शहर में जाने पर कोई भी पावन शहर करतारपुर जा सकता है। यहां पर गुरु अर्जन देव की जयंती पर वार्षिक मेला आयोजित होता है। इसके निकट नूर महल स्थित है, जो मध्यकालीन सुंदर सराय के अवशेषों के लिए लोकप्रिय है तथा जिसका निर्माण मुग़ल रानी नूरजहां ने करवाया था। यह शहर फिल्लौर के लिए भी प्रसिद्ध है, जो अपने किले तथा हड़प्पा सभ्यता के समय के पुरातात्विक स्थलों के लिए लोकप्रिय है। जालंधर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर दक्कानी सराय स्थित है, जो एक रेस्तरां है और देखने लायक जगह है।

इस शहर के अन्य आकर्षणों में सेंट मैरीस कैथेडिन्न्ल गिरिजाघर, गुरुद्वारा छेवीं पदशाही तथा देवी तालाब जो असुर सम्राट जालंधर की पत्नी वृंदा को समर्पित है, प्रमुख हैं। जालंधर के निकट एक अन्य शहर जो देखने लायक है, वह नकोदर है। यहां पर वास्तुशिल्प के दो नायाब उदाहरण, मोहम्मद मोमिन तथा हाज़ी जमाल का मकबरा स्थित हैं। सूफ़ी संत बाबा मुराद शाह की पीर भी यहां पर स्थित है। सितम्बर में यहां पर भव्य मेला आयोजित किया जाता है। इसमें राज्य भर से संगीतकार एवं गायक हिस्सा लेने यहां आते हैं। विश्व के सबसे पुराने शास्त्रीय संगीत महोत्सवों में से एक हरभल्लभ संगीत महोत्सव दिसम्बर में यहां पर आयोजित होता है।

जालंधर

लुधियाना

अमृतसर से 140 किलोमीटर दूर, सतलुज नदी के दक्षिण किनारे पर बसा औद्योगिक शहर लुधियाना है। यह शहर उद्योगों में उपयुक्त होने वाले सामान के निर्माण, मशीनों के पुर्जे, ऑटो के पुर्जे, घरेलू सामान, होज़री एवं कपड़ों के उत्पादन के लिए विख्यात है। लुधियाना शहर की स्थापना 15वीं सदी में लोधी सुल्तानों के शासनकाल के दौरान की गई थी। अगर कोई लुधियाना जाता है तो वह पंजाब कृषि विश्वविद्यालय देख सकता है जो 1,500 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैला है। यहां ग्रामीण जीवन का अवलोकन कराता एक अद्भुत संग्रहालय है जिसमें पारंपरिक बर्तन, संगीत वाद्य एवं पंजाबी पोशाकें प्रदर्शित की गई हैं। कृषि क्षेत्र में लाभप्रदता एवं उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से 1962 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। यहां का एक अन्य आकर्षण वार्षिक किसान मेला है, जिसमें समस्त राज्य से किसान हिस्सा लेते हैं।  

इस संग्रहालय के निकट सुंदर नेहरु रोज़ गार्डन स्थित है, जिसमें गुलाब की सैकड़ों प्रजातियां तथा सजावटी फव्वारे देखने को मिलेंगे। यहां पर एक और आनंददायक संग्रहालय है जिसमें पंजाबी सैन्य इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है। यह महाराजा रणजीत सिंह युद्ध संग्रहालय कहलाता है।

लुधियाना