चहल-पहल वाला अमृतसर शहर अदम्य भावना से परिपूर्ण है, जिसके केंद्र में सिखों के पवित्रतम गुरुद्वारों में से एक स्वर्णमंदिर स्थित है। इस पर 400 किलोग्राम सोना लगाया गया है और जो एक निर्मल सरोवर से घिरा हुआ है। इस चमकदार संरचना पर नज़र पड़ते ही किसी का भी सिर श्रद्धा से तुरंत झुक जाता है। यहां पर देश के सबसे बड़े लंगर में से एक लगता है, जिसमें प्रतिदिन करीब 20,000 लोग खाना खाते हैं। यद्यपि आगंतुक स्वर्णमंदिर के दर्शनों के लिए यहां पर आते हैं, किंतु पुराने शहर का आकर्षण उनके सिर चढ़कर बोलता है। लोगों को इस शहर से लगाव-सा हो जाता है, जो उत्साही एवं जीवंत बारीकियों से गुंजित रहता है। भले ही वह जलियांवाला बाग की गोलियों से छलनी दीवार हो अथवा दिल में जोश जगाने वाला वाघा बॉर्डर का दृश्य, जो कोई भी शहर में कदम रखता है उसे उन हज़ारों लोगों के जुनून का पता चलता है, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। शहर के परिदृश्य में दिखने वाली इंडो-ब्रिटिश शैली में बनी अनेक इमारतें यहां के समृद्ध इतिहास तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इनके महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख करती हैं। इसके अलावा, यह शहर स्वादिष्ट खानों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो यहां के अतिव्यस्त एवं शानदार बाज़ारों में मिलता है। ये व्यंजन विविधता एवं स्वाद के कारण आपका दिल जीत लेंगे। यहां पर मिलने वाले व्यंजनों में मक्खन लगे परांठे, मलाईदार लस्सी, दही-भल्ला एवं आलू-टिक्की प्रमुख हैं। ये व्यंजन स्वाद और सुगंध से भरपूर होते हैं। इन सबके अतिरिक्त जो बात इस शहर की यात्रा को यादगार बनाती है वह यहां के लोगों की गर्मजोशी भरा व्यवहार है।

अमृतसर का नाम पवित्र तालाब ‘अमृत सरोवर’ पर पड़ा है। इस पावन सरोवर के मध्य में सिख धर्म का सबसे पवित्र स्वर्णमंदिर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सिखों के चौथे गुरु - गुरु रामदास - ने इस शहर को 1574 ईस्वीं में बसाया था। ऐसा कहा जाता है कि गुरु रामदास ने घने जंगलों के बीचोंबीच सरोवर बनाने के लिए ज़मीन का एक टुकड़ा लिया था। किंतु इसके बनने से पूर्व उनकी मृत्यु हो गई। लोककथाओं में बताया गया है कि गुरु रामदास ने 52 व्यापारियों को यहां लाकर बसाया था। उन कारोबारियों ने यहां 32 दुकानें बनाईं जो आज भी अमृतसर में हैं। ये बत्तीस हट्टा के नाम से लोकप्रिय हैं। तत्पश्चात् इस सरोवर का निर्माणकार्य गुरु रामदास के उत्तराधिकारी गुरु अर्जन देव ने पूरा करवाया। रोचक तथ्य यह है कि अमृतसर का उल्लेख हिंदुओं के महाग्रंथ रामायण में भी किया गया है। भगवान राम तथा सीता मइया के जुड़वां पुत्रां, लव और कुश ने जन्म यहीं पर हुआ था। अमृतसर का विकास बाद में महाराजा रणजीत सिंह से करवाया। वह पंजाब राज्य के संस्थापक एवं राजा (1801-39) भी थे।