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वसंत ऋतु का पारंपरिक रूप से स्वागत करने के लिए मेवाड़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस महोत्सव को बड़ी धूमधाम एवं भव्य रूप में मनाते हैं। यह महोत्सव राजस्थान के उदयपुर में मनाए जाने वाले प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। इस तीन दिवसीय महोत्सव की तैयारियां कई महीने पहले से ही आरंभ हो जाती हैं। आकर्षण से परिपूर्ण इस महोत्सव को देखने न केवल देश भर के अपितु विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में यहां खिंचे चले आते हैं। इस महोत्सव में हिस्सा लेने भारत के कोने-कोने से कलाकार भी आते हैं।
     
अनुष्ठान और समारो
हराजस्थान में मनाए जाने वाले गंगौर महोत्सव की ही भांति, मेवाड़ महोत्सव भी बहुत लोकप्रिय है। इस महोत्सव का आयोजन होली के अगले दिन आरंभ हो जाता है। इस समारोह की शुरुआत में एकत्रित लोग होलिका दहन की राख लेकर आते हैं। इस राख में जौ के बीजों को दबा दिया जाता है और उन्हें तब तक पानी से सींचा जाता है जब तक कि वे अंकुरित नहीं हो जाते। इस महोत्सव के दौरान महिलाएं अपने पति की लंबी आयु की कामना करते हुए उपवास रखती हैं। 

महोत्सव के पहले दिन महिलाएं पारंपरिक पोशाकों में सज-धजकर तैयार होती हैं। वे अपने सिर पर इसर (भगवान शिव) एवं गंगौर (देवी पार्वती) की प्रतिमाएं रखती हैं। वे इन प्रतिमाओं को लेकर पिछोला झील तक जाती हैं। यह पारंपरिक जुलूस उदयपुर के घंटाघर से आरंभ होकर झील तक पहुंचता है। इसके बाद प्रतिमाओं को विसर्जित करने के लिए महिलाएं नौकाओं पर सवार होती हैं। 

इसके बाद आरंभ होता है रंगा-रंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, जिसमें राजस्थान की आकर्षक विरासत की सुंदर झलक देखने को मिलती है। कलाकार विभिन्न प्रकार के लोकगीतों के साथ लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। लोक कलाकार