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केरल राज्य के हर हिस्से में मनाए जाने वाला ओणम, मलयालियों का बहुत लोकप्रिय पर्व है। यह पर्व दस दिनों तक मनाया जाता है। ओणम का आरंभ अथम के दिन होता है जो थीरू ओणम या तिरुवोनम को समाप्त होता है। इसका अर्थ होता है ओणम का पावन दिवस। इस पर्व के माध्यम से हमें इस राज्य के विभिन्न रंगों तथा संस्कृति को देखने का मौका मिलता है। इस मौके पर यहां के लोग आनंद से भरपूर समय बिताते हैं। पहले दिन, गलियों में जुलूस निकाला जाता है, जिसमें सजे-धजे हाथी होते हैं। तरह-तरह की झांकियां होती हैं। चमकीली पोशाकों में नृतक एवं संगीतकार तथा अन्य कलाकार हिस्सा लेते हैं।

ओणम को फूलों के त्योहार के नाम से भी जाना जाता है। जब पूकलम (फर्श पर पुष्पों की रंगोली) बनाई जाती है। ये रंगोली अमूमन घरों के दरवाज़ों अथवा मंदिर द्वारों के सामने बनाई जाती हैं। ओणम का सबसे आकर्षक आयोजन पुलिकलि यानी कि बाघ का नाटक होता है। पारंपरिक नृतक, लगभग 200 साल पुराना नाच करते हैं। सैकड़ों की संख्या में लोग बाघ की वेश-भूषा में सड़कों पर निकल पड़ते हैं। वे संगीत की लय पर नाचते हैं। ओणम पर्व के मौके पर नौका रेस भी होती हैं। सर्प नौका दौड़ या वल्लमकलि पम्पा नदी पर आयोजित की जाती है। ये रेस देखने लायक होती हैं। ओणम की अन्य विशेषताओं में से एक यह भी है इस पर्व के दौरान पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। जो ओणम साद्य कहलाते हैं, जिनमें 28 प्रकार के व्यंजन खाने को मिलते हैं। इन पकवानों को केले के पत्ते पर परोसा जाता है। साद्य के कुछ लोकप्रिय पकवानों में अविअल (जो सब्ज़ियों, नारियल की चटनी एवं हरी मिर्च से बनती है), थोरण (पिसी हुई सेम, बंदगोभी, मूली व नारियल के चूरे से बनी) तथा ओलन (कद्दू, अरहर को नारियल पानी में बनाया जाता है) प्रमुख होते हैं। मीठे में पायसम (दूध और भूरी खांड से बना) व्यंजन परोसा जाता है। अंत में भात व रसम (इमली के रस से बनी तरी) से बना पकवान खाने को दिया जाता है।