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भारत में बहुत श्रद्धा से मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहारों में से एक महाशिवरात्रि भी है। यह पर्व भगवान शिव को समर्पित है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है शिव की रात और यह पर्व हर साल सर्दियों की समाप्ति पर फरवरी माह में मनाया जाता है।

कैसे मनाते हैं यह पर्व?महाशिवरात्रि के दौरान श्रद्धालुगण पूरे दिन व पूरी रात उपवास रखते हैं। वे सभी मंदिर जो भगवान शिव को समर्पित होते हैं, इस दिन विशेष रूप से सजाए जाते हैं। इन मंदिरों में सवेरे से ही श्रद्धालुगणों की भीड़ उमड़ने लगती है। मंदिरों में विद्यमान लिंगम ;प्रतिमाद्ध के समक्ष श्रद्धालु पूजा करते हैं। उसके बाद लोग गंगा नदी के पावन जल में स्नान करते हैं। स्नान करने के पश्चात् लोग पात्र में गंगाजल भरकर लाते हैं और शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि की पूजा करने के छः चरण होते हैं।

पहले चरण में, गंगा में स्नान करते हैं और उसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं व दूध-शहद चढ़ाते हैं। तत्पश्चात् शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाया जाता है और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। शिवलिंग के निकट दीप जलाने की परंपरा रही है। इसका अर्थ होता है कि भगवान हमें सद्बुद्धि एवं ज्ञान का भंडार दे। यह क्रिया पूरी करने के बाद शिवलिंग पर पान के पŸो चढ़ाए जाते हैं। श्रद्धालुगण पूजा-अर्चना करने के बाद अपने माथे पर भभूत लगाते हैं। यह तन-मन की स्वच्छता, तपस्या और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए किया जाता है। लोग अपने गले में रुद्राक्ष के मनकों की माला भी धारण करते हैं। 

वाराणसी में उत्सव
वाराणसी को शिव की नगरी कहा जाता है। अतः महाशिवरात्रि जो भगवान शिव के विवाह की रात होती है, यहां पर इस पर्व का विशेष महŸव है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, महाशिवरात्रि फागुन माह ;फरवरी/मार्चद्ध के 14वें दिन होने वाली अमावस्य को मनाई जाती है। इस अवसर पर वाराणसी के सभी मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। भगवान शिव की भव्य एवं सुसज्जित बारात भी निकाली जाती है। यह बारात दारानगर में स्थित महामृत्युंजय मंदिर से आरंभ होकर विश्वनाथ मंदिर तक जाती है। इस अवसर पर यहां एक विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है। श्रद्धालुगण सवेरे से ही मंदिरों में एकत्रित होने लगते हैं, वे दिन में और रातभर मंदिरों में उपस्थित रहकर पूजा करते हैं। लोग शिव की प्रतिमा एवं शिवलिंग पर पुष्प, नारियल, भांग, धतुरा, फल इत्यादि अर्पित करते हैं। 

मिथक एवं किंवदंतियां
इस पर्व को मनाने के पीछे भी एक रोचक इतिहास है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों ने अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। अमृत की प्राप्ति से पहले घातक विष की प्राप्ति हुई। यह विष भाप बनकर पूरे ब्रह्मांड में फैलने लगा, जिससे सभी के लिए ख़तरा उत्पन्न हो गया। तब सभी देवता दौड़कर भगवान ब्रह्म एवं भगवान विष्णु के पास पहुंचे और मदद की गुहार लगाई। किंतु वे देवतों की किसी भी तरह से कोई मदद नहीं कर पाए। अंत में वे भगवान शिव के पास गए और मदद मांगी। तब समस्त ब्रह्मांड को बचाने के लिए शिव ने विषपान किया। इसका प्रभाव यह पड़ा कि शिव का कंठ नीला हो गया। इसीलिए शिव को नीलकंठ भी कहते हैं। ऐसी लोकप्रिय मान्यता है कि इस घटना को I