calendar icon Sun, October 27, 2019

भारत में मनाए जाने वाले लभगभ हर त्योहार हमारे देश की जीवंत संस्कृति एवं प्राचीन परंपराओं का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इन सभी पर्वों में दीवाली सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। जो रोशनी के पर्व के रूप में प्रसिद्ध है और इसे अक्टूबर अथवा नवम्बर माह में मनाते हैं। देश के अन्य पर्वों की भांति इसे मनाने की कथा पुराणों, धर्म एवं किंवदंती से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम 14 वर्षों का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उनके राज्य की जनता इतनी प्रसन्न हुई कि उन्होंने घर-घर में दीप जलाकर रोशनी की और अपनी खुशी जताते हुए राम का स्वागत किया। आज भी, लाखों लोग अपने घरों को मोमबत्तियों एवं दीयों से सजाते हैं और इस पर्व को मनाने के लिए पटाखे जलाते हैं।

क्यों मनाते हैं यह पर्व?
दीवाली मनाने के पीछे की कथा बहुत ही प्रभावशाली एवं मनोरंजक है। इसका उल्लेख रामायण एवं महाभारत में भी मिलता है। एक कथा तो यह है कि भगवान राम अपना 14 वर्षों का वनवास पूरा कर तथा लंकापति रावण का संहार करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने की खुशी में यह पर्व मनाया जाता है। वहीं पांच पांडव भी लंबा वनवास पूरा करके आए थे। ऐसा कहा जाता है कि उनके लौटने की खुशी में भी लोगों ने दीप जलाए और पटाखे फोड़े थे। एक हिमाचली किंवदंती के अनुसार महाभारत का युद्ध दीपावली पर ही आरंभ हुआ था। इस कारण से दीपों के त्योहार को एक अलग तरह से आरंभ करने का श्रेय इसे ही जाता है। वहीं जैन धर्म के अनुसार, दीवाली के ही दिन उनके अंतिम तीर्थंकर - भगवान महावीर को इसी दिन निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। 

पश्चिम बंगाल में जहां दीवाली पर मां काली की पूजा-अर्चना की जाती है, वहां भी इस पर्व से जुड़ी अनेक रोचक किस्से-कहानियां हैं। ऐसी मान्यता है कि काली ने जब सभी असुरों का नाश कर दिया तो वह आपा खो बैठीं और उनके रास्ते में जो कुछ भी आता वह उसे नष्ट करने लगीं। जब भगवान शिव उनके मार्ग में जा लेटे और मां काली का पैर उन पर जा पड़ा तो वह ठिठक गईं और उनकी सुध-बुध लौट आई। 

भारत के दक्षिण भाग में प्रचलित पौराणिक कथाओं के अनुसार दीवाली के दिन ही भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सम्पूर्ण पृथ्वी पर राजा बाली का शासन हुआ करता था। वह चाहता था कि स्वर्ग पर भी उसका अधिकार स्थापित हो जाए। भगवान विष्णु एक बौना पुजारी बनकर बाली के दरबार में पहुंचे और उन्होंने कहा कि उसे उतनी जगह दी जाए जितनी उसके पैरों के नीचे आएगी। बाली ने हामी भर दी तो भगवान ने विशाल रूप धारण कर लिया। उनके दो ही कदम में पूरी धरती समाहित हो गई थी। उनके तीसरे पैर के लिए बाली ने अपना सिर आगे कर दिया। विष्णु ने अपना पैर बाली के सिर पर रखा और जिससे वह पाताल में धंस गया। बाली अपने कहे पर कायम रहा इसलिए भगवान विष्णु ने उसे वर्ष में एक बार धरती पर आने की अनुमति प्रदान कर दी। उसके आने पर भी लोग दीये जलाकर खुशी जताते हैं।

कैसे मनाते हैं यह पर्व?
दीवाली पर संपत्ति एवं समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। कई लोगों द्वारा यह त्योहार लक्ष्मी की उत्पत्ति  के रूप में भी मनाया जाता है क्योंकि अमावस्या के दिन राक्षसों और देवताओं द्वारा समुद्र मंथन के दौरान ही लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। समुद्र मंथन भी दिवाली के दिन ही हुआ है। लोग अपने घरों की साफ़-सफ़ाई करते हैं तथा दीयों की रोशनी करते हैं ताकि लक्ष्मी को उनके घर आने का रास्ता मिल सके। वे उनके घर आकर उन्हें आशीष दें। लोग इस दिन इसलिए पटाखे चलाते हैं ताकि बुरी आत्माएं दूर चली जाएं। 

दीवाली की तैयारियां कई दिनों पहले ही आरंभ हो जाती हैं। परिजन एवं मित्रगण एक दूसरे के यहां आते-जाते हैं और एक दूसरे को उपहार भेंट करते हैं। इस अवसर पर स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं और तरह-तरह की मिठाइयां बनती हैं। लोग अपने घरों को फूलों की लड़ियों से सजाते हैं तथा आंगन या प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाते हैं। 

देश भर में विभिन्न तिथियों पर दीवाली का पर्व मनाया जाता है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले के अनी और निरमंद क्षेत्रों में बूढ़ी दीवाली, सिरमौर ज़िले में शिलाई और शिमला ज़िले में छोपाल लगभग दीवाली के 30 दिनों बाद मनाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम को पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंचने में एक माह का समय लग गया था। इसके अलावा अन्य कारण एवं मौसम का भी बहुत प्रभाव रहता है। इन सब तथ्यों के बावजूद यह तो निश्चित है कि दीवाली का मतलब सभी के लिए वर्ष की इस अवधि में नई चीज़ों की शुरुआत करना, सकारात्मकता एवं उत्साह की नवीन गाथा गढ़ना ही होता है।