भारत में गांधीजी के पदचिह्नों का अनुसरण

1915
से 1948 तक, महात्मा गांधी ने भारत भर में बड़े पैमाने पर यात्रा की, क्रांति की मशाल
प्रज्जवलित की तथा सभी समय के महानतम स्वतंत्रता संघर्षों में से एक के लिए देश कोएकजुट करने का कार्य किया। जनसैलाब 9 जनवरी, 1915 को गांधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा का स्वागत करने के लिए बाॅम्बे के अपोलो बंदरगाह ‘अब मुंबई’ पर उपस्थित थे। उनका जलपोत एस. एस. अरेबिया बंदरगाहपर आ चुका था। गांधीजी ने अपने संबंधी मगनलाल को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने वर्णन किया, ‘‘बंबई के निकट पहुंचकर जब मैंने समुद्रीतट देखा तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं
रहा।’’ लगभग 22 साल हो गए थे जब उत्सुक युवा वकील अपने करियर में एक सुअवसर पाने की तलाश में अपने घर से बाहर निकल गए थे। अब जब वह लौट आए थे, तब वह एक अनुभवी सत्याग्रही बन चुके थे, जो अपने समय के सबसे महान नेताओं में से एक के रूप में प्रतिष्ठित थे। पोरबंदरबंबई में थोड़ा समय व्यतीत करने के पश्चात, गांधीजी अपनी जन्मस्थली पोरबंदर गए। वह और उनकी पत्नी जैसे ही ट्रेन से उतरे, उनके दर्शनों के लिए लोगों का हुजूम उनकी ओर बढ़ा। हर कोई जानना चाहता था कि वह व्यक्ति अब कैसा दिखता है, जिसे उन्होंने इतनी ख्याति मिलने
से पहले इस शहर में देखा था। लोगों की धक्का-मुक्की में गांधीजी और कस्तूरबा को रास्ता नहीं मिल रहा था और वे मोटर कार तक भी नहीं जा पा रहे थे। उन्हें कार द्वारा ही अपने पैतृक घर कीर्ति मंदिर जाना था। कीर्ति मंदिर 200 वर्षों पुराना भवन परिसर था, जहां
1869 में गांधीजी का जन्म हुआ था। वर्तमान में, उन लोगों के लिए एक प्रकार की वेदी है जो बापू के पद्चिह्नों और उनकी विचारधाराओं का अनुसरण करते हैं। विशाल आंगन, एक खुली छत और लोहे की ग्रिड की खिड़कियों के साथ चैकोर आकार की हवेली, युवा गांधी के संस्मरणों और चित्रों से सुसज्जित है। दीवार पर एक चित्र
टंगा हुआ है, जिसके नीचे ‘सात साल के गांधीजी’ लिखा हुआ है। उस चित्र में एक लड़का जैकेट पहने हुए है और उसके सिर पर गोल टोपी भी है, जिसे बाद में विश्व विख्यात गांधी टोपी के नाम से जाना गया। उस बालक के माथे पर एक टीका और उसके गले में एक चेन है। इनके अलावा कस्तूरबा गांधी की भी अनेक तस्वीरें हैं, जिनमें दोनों हंसी-मज़ाक करते हुए दिखाया गया है। सन 1944 में गांधीजी को जेल से रिहा करने की याद में, पोरबंदर के लोगों ने हवेली के साथ
ही एक मंदिर का निर्माण किया। अब इस मंदिर को एक छोटे से संग्रहालय में परिवर्तित कर
दिया गया है। इसमें उन वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, जिनका उपयोग गांधीजी किया
करते थे तथा कुछ पुरानी तस्वीरें भी रखी गई हैं। इस संग्रहालय में एक पुस्तकालय भी
है, जिसमें उनके द्वारा लिखित अथवा उनके दर्शन व सिद्धांतों से संबंधित किताबें सहेजकर
रखी गई हैं। गांधीजी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए विश्व के अनेक महान नेता इस
मंदिर में जा चुके हैं। राजकोटगांधीजी
ने अपना सत्याग्रह आंदोलन आरंभ करने से पहले देश भर की यात्रा की थी। उन्होंने ये यात्राएं
रेल द्वारा की ताकि वह भारत के सामाजिक ताने-बाने को भली-भांति समझ सकें। जैसा कि उन्होंने
अपने मित्र, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले से वादा किया था,
गांधीजी ने स्वयं को ‘प्रोबेशन पीरियड‘ पर रखा और राजकोट से अपनी यात्रा आरंभ की, जहां
उन्हांेने दीवान के पुत्र के रूप में ‘सन 1881 से 1887 तक’ अपना बचपन बिताया था। उनका निवास
स्थान काबा गांधी नो डेलो, आज एक विशेष विरासत स्थल बन गया है। इस भवन में विद्यमान
छायाचित्रों से कोई भी महात्मा गांधी के जीवन से संबंधित घटनाओं की जानकारी प्राप्त
कर सकता है। इन चित्रों के नीचे हिंदी अथवा गुजराती में कैप्शन लिखे हुए हैं। यह भवन
सौराष्ट्रीय शैली में बना हुआ है तथा इसमें मेहराबादार द्वार व आंगन है। गांधीजी की
व्यक्तिगत वस्तुओं के प्रतिरूप तथा अन्य अनेक प्रकार की चीज़ें यहां पर रखी हुई हैं।
हथकरघा के प्रति गांधी के जुनून को यहां एक बुनाई स्कूल के रूप में प्रोत्साहित किया
गया है। इस स्कूल में युवा लड़कियों को सिलाई और कढ़ाई का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता
है। बनारस
‘वाराणसी’गांधीजी
के ‘प्रोबेशन पीरियड‘ की समाप्ति के बाद 1916 में उन्हें बनारस हिंदू
विश्वविद्यालय ‘बीएचयू’ की आधारशिला रखने के लिए वाराणसी बुलाया गया
था। ऐसा कहा जाता है कि उनके द्वारा दिए गए ओजस्वी भाषण ने भारत में उनके राजनीतिक
आंदोलन की शुरुआत का ही संकेत दिया था। उन्होंने
कहा था, ‘‘यह हमारे लिए बहुत अपमान और शर्म की बात है कि मैं इस शाम को इस महान काॅलेज
की छाया में, पवित्र शहर में, अपने देशवासियों को एक ऐसी भाषा में संबोधित करने के
लिए बाध्य हूं जो मेरे लिए एक विदेशी भाषा है।’’ जब
इस शांत शहर ने, जब उनके द्वारा बेधड़क होकर बोले गए ये शब्द सुने तब सभी को ऐसा प्रतीत
हुआ कि आंदोलन का आह्वान कर दिया गया है और एक बड़े नेता का आगमन हुआ है। वर्तमान
में, जब कोई इस विश्वविद्यालय परिसर में टहलता है तब किसी को भी गांधी की आभा का अहसास
हो सकता है।बाद
में, सन 1936 में गांधीजी ने इस शहर में प्रसिद्ध भवन - भारत माता मंदिर का उद्घाटन
किया, जो मील का पत्थर साबित हुआ। इस अनोखे मंदिर में किसी देवी-देवता की पूजा-अर्चना
नहीं की जाती अपितु भारत माता की स्तुति होती है। इसमें संगमरमर से बनी भारत माता की
एक प्रतिमा है, जो भारत की छवि का संकेत देती है। इससे यही आभास होता है कि भारत माता
सभी धर्मों को मानने वालों, नेताओं तथा स्वतंत्रता सेनानियों की देवी हैं। इसमें संगमरमर
से बना अखंड भारत का भौगोलिक मानचित्र भी है, जिसमें मैदानों, पर्वतों एवं समुद्र को
दिखाया गया है। अहमदाबादशांतिनिकेतन,
पश्चिम बंगाल में कुछ समय ठहरने के बाद, जहां पर वह नोबल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ
टैगोर से मिले थे, गांधीजी 1915 में सीधे अहमदाबाद गए। वहां पर उन्होंने साबरमती नदी
के किनारे पर सामुदायिक भवन का निर्माण किया, जिसका नाम साबरमती आश्रम रखा। यह आश्रम
अंग्रेज़ों के विरुद्ध उनके अहिंसावादी संघर्ष का मुख्य केंद्र हुआ करता था। यहां
पर आज भी उनकी आभा का प्रत्यक्ष आभास होता है और जो यहां पर घूमने आता है, उसे गांधीजी
की विचारधारा एवं उल्लेखनीय जीवन से रूबरू होने का सुअवसर मिलता है। उनके अहिंसावादी
संघर्ष से संबंधित दस्तावेज़ यहां पर विद्यमान हैं, साथ ही दांडी मार्च का भी उल्लेख
मिलता है जो गांधीजी ने साबरमती आश्रम से आरंभ किया था। ये सभी कुछ गांधी स्मारक संग्रहालय
में प्रदर्शित करके रखा गया है। यहां पर एक पुस्तकालय भी है, जिसमें गांधीजी द्वारा
लिखे गए पत्र रखे गए हैं, जो उन्होंने विभिन्न नेताओं को लिखे थे। इनमें से अधिकतर
पत्रों को लिखने के लिए रद्दी के काग़ज़ों का उपयोग किया गया था। इस आश्रम के निकट ही
हृदयकुंज स्थित है, जहां पर गांधीजी रहा करते थे। विनोबा-मीरा कुटीर, जो मेहमानों के
लिए था तथा यहां पर प्रार्थनाघर व एक भवन भी था, जिसका उपयोग कुटीर उद्योग के लिए प्रशिक्षण
हेतु किया जाता था। जब
आश्रम की स्थापना हुई तब तक गांधीजी ने धोती एवं पादुकाएं धारण करनी आरंभ कर दी थीं,
जो उनकी पहचान बन गई थीं, उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा को दरकिनार करते हुए निर्धन लोगों
के साथ घुल-मिलकर रहने के लिए ही इन्हें धारण किया था। जल्दी ही, उन्होंने कताई एवं
बुनाई सीख ली थी और खादी का उत्पादन आरंभ कर दिया था। खादी कातना एक अहम अभियान बन
गया। बाॅम्बे
‘मुंबई’गांधीजी
जिस क्षण भारत पहुंचे, लगभग छः राष्ट्रीय आंदोलनों के शुभारंभ के बाद, बाॅम्बे
1917 और 1934 के बीच उनकी अधिकांश गतिविधियों का केंद्र बना रहा। गांधीजी इस शहर में
स्थित मनी भवन में ही ठहरा करते थे, जो दो-मंज़िला इमारत थी। सन 1955 में विरासत की
धरोहर इस भवन को महात्मा गांधी के स्मारक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था जो भारत
की स्वतंत्रता की कहानी का इतिहास बयां करता है। उल्लेखनीय है कि, 1921 मंे महात्मा
गांधी ने चार दिवसीय उपवास यहीं पर रखा था ताकि मुंबई में शांति बनी रह सके। मनी भवन
में गांधीजी चरखे के साथ ठहरे थे और वह वहां पर खादी कातते थे। रोचक तथ्य यह है कि
सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह, स्वदेशी, खादी एवं खिलाफ़त जैसे आंदोलनों का आरंभ यहीं से
किया गया था। इस इमारत के बड़े बरामदों में घूमते हुए हमें उन राजनीतिक संघर्षों के
बारे में जानने को मिलेगा, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किए गए थे। इस संग्रहालय
के फोटो संभाग में सूचनाओं का भंडार व्याप्त है, जिससे भारतीय इतिहास की व्यापक जानकारी
मिलती है। पुणेसन
1942 में, जब ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ आंदोलन आरंभ किया गया तब गांधीजी एवं कस्तूरबा
को उनके सचिव महादेव देसाई के साथ पुणे के आगा ख़ान पैलेस में नज़रबंद कर दिया गया था।
इस महलनुमा हवेली का निर्माण सन 1892 में सुल्तान मोहम्मद शाह आगा ख़ान तृतीय ने करवाया
था। यही वह स्थान था, जहां पर दिल का दौरा पड़ने से बा ‘कस्तूरबा गांधी इसी नाम से प्रसिद्ध
थीं’ और
देसाई का निधन हो गया था। संगमरमर से बनीं उनकी प्रतिमाएं अब भी यहां पर बनी हुई हैं। वर्तमान
में, इस भव्य भवन में इतालवी वास्तुशिल्प तथा ऐसे बाग देखने को मिलते हैं, जिनमें मूर्तियां
लगी हुई हैं। अब यह गांधी राष्ट्रीय स्मारक सोसाइटी का मुख्यालय है। खादी, जो हाथ से
बना प्राकृतिक सूत होता है, जिसे महात्मा गांधी अपने चरखे से कातते थे, यह आज भी यहां
पर बनाई जाती है। 2.5 मीटर लंबा गोलाकार गलियारा जो बेहद प्रसिद्ध है, महल के चारों
ओर स्थित है। यहां पर अनेक छायाचित्र हैं जिनमें महात्मा गांधी और स्वतंत्रता संग्राम
से संबंधित अन्य नेताओं का चित्रण किया गया है। इनमें से सबसे प्रभावशाली चित्र वह
है, जिसमें गांधीजी को अंग्रेज़ों के विरुद्ध किए गए मार्च का नेतृत्व करते हुए दिखाया
गया है। आगंतुक यहां पर गांधीजी द्वारा किए गए कार्यों का भी अवलोकन कर सकते हैं, जो
उन्होंने सेवाग्राम में किया था। यह यहां से 8 किलोमीटर दूर वर्धा गांव में स्थित है।
इस महल की अन्य विशेषताओं में वह कक्ष भी है, जिसमें गांधीजी कस्तूरबा के साथ रहा करते
थे। उस कक्ष में उनका चरखा, पादुकाएं एवं अन्य वस्तुएं रखी हुई हैं। दिल्लीवह
जनवरी का सर्द दिन था। 78 वर्षीय महात्मा गांधी बिरला हाउस से चलकर उस बाग की ओर जा
रहे थे, जहां पर प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। वह अपनी दो भतीजियों के कंधों
का सहारा लेकर लोगों से मिल रहे थे। तभी एक व्यक्ति उनके करीब आया, जिसने नीली पेंट
एवं खाकी कमीज़ पहन रखी थी, उसने बापू का अभिनंदन किया। नमस्ते कहने के बाद उस व्यक्ति
ने पिस्तौल निकाली और बेहद करीब से गांधीजी पर तीन गोलियां दाग दीं। बाद में उसकी पहचान
नाथूराम गोडसे के रूप में हुई।गांधीजी
के निधन पर देश ने एक महान नेता को खो दिया था। उनकी एक भव्य समाधि देश की राजधानी
में राजघाट पर बनाई गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार 31 जनवरी,
1948 को यहीं पर किया गया था। आज भी लाखों लोग गांधीजी को श्रद्धांजलि देने यहां पर
आते हैं। यमुना नदी के किनारे पर स्थित राजघाट हरियाली से भरा हुआ है। इस लाॅन में
अनेक पेड़ लगे हुए हैं। गांधीजी की समाधि उनके सादे व्यक्तित्व को ही प्रतिबिंबित करती
हुई प्रतीत होती है। जहां उनके पार्थिव शरीर को अग्नि दी गई थी, वहां पर काले पत्थर
का एक बड़ा सा चबूतरा बनाया गया है। उसके चारों ओर संगमरमर की बाड़ लगाई गई है। इस पर
‘हे राम’ लिखा
हुआ है, जो उनके अंतिम शब्द थे। इसके साथ ही एक अखंड ज्योति जलती रहती है। इस मैदान
के आसपास जो वृक्ष लगे हैं वे किसी न किसी मशहूर हस्ती द्वारा लगाए गए हैं। इनमें महारानी
एलिज़ाबेथ द्वितीय, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहाॅवर, आॅस्ट्रेलिया के
पूर्व प्रधानमंत्री गफ़ वाइटमैन इत्यादि शामिल हैं। इन वृक्षों पर एक पट्टी लगी है जिन
पर इन नेताओं का नाम भी लिखा है। इस महान नेता को श्रद्धांजलि देने जाने से पहले आगंतुकों
को जूते उतारने होते हैं। जिस दिन बापू का निधन हुआ था, उसकी याद में प्रत्येक शुक्रवार
को एक अनुष्ठान किया जाता है। इसके निकट ही दो संग्रहालय भी स्थित हैं जो गांधीजी को
समर्पित हैं। यद्यपि
यह दिन एक व्यक्ति के अंत को चिह्नित करने की दिशा में मनाया जाता है, किंतु यह एक1915
से 1948 तक, महात्मा गांधी ने भारत भर में बड़े पैमाने पर यात्रा की, क्रांति की मशाल
प्रज्जवलित की तथा सभी समय के महानतम स्वतंत्रता संघर्षों में से एक के लिए देश को
एकजुट करने का कार्य किया। जनसैलाब
9 जनवरी, 1915 को गांधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा का स्वागत करने के लिए बाॅम्बे के
अपोलो बंदरगाह ‘अब मुंबई’ पर उपस्थित थे। उनका जलपोत एस. एस. अरेबिया बंदरगाह
पर आ चुका था। गांधीजी ने अपने संबंधी मगनलाल को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने वर्णन
किया, ‘‘बंबई के निकट पहुंचकर जब मैंने समुद्रीतट देखा तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं
रहा।’’ लगभग
22 साल हो गए थे जब उत्सुक युवा वकील अपने करियर में एक सुअवसर पाने की तलाश में अपने
घर से बाहर निकल गए थे। अब जब वह लौट आए थे, तब वह एक अनुभवी सत्याग्रही बन चुके थे,
जो अपने समय के सबसे महान नेताओं में से एक के रूप में प्रतिष्ठित थे। पोरबंदरबंबई
में थोड़ा समय व्यतीत करने के पश्चात, गांधीजी अपनी जन्मस्थली पोरबंदर गए। वह और उनकी
पत्नी जैसे ही ट्रेन से उतरे, उनके दर्शनों के लिए लोगों का हुजूम उनकी ओर बढ़ा। हर
कोई जानना चाहता था कि वह व्यक्ति अब कैसा दिखता है, जिसे उन्होंने इतनी ख्याति मिलने
से पहले इस शहर में देखा था। लोगों की धक्का-मुक्की में गांधीजी और कस्तूरबा को रास्ता
नहीं मिल रहा था और वे मोटर कार तक भी नहीं जा पा रहे थे। उन्हें कार द्वारा ही अपने
पैतृक घर कीर्ति मंदिर जाना था। कीर्ति मंदिर 200 वर्षों पुराना भवन परिसर था, जहां
1869 में गांधीजी का जन्म हुआ था। वर्तमान
में, उन लोगों के लिए एक प्रकार की वेदी है जो बापू के पद्चिह्नों और उनकी विचारधाराओं
का अनुसरण करते हैं। विशाल आंगन, एक खुली छत और लोहे की ग्रिड की खिड़कियों के साथ चैकोर
आकार की हवेली, युवा गांधी के संस्मरणों और चित्रों से सुसज्जित है। दीवार पर एक चित्र
टंगा हुआ है, जिसके नीचे ‘सात साल के गांधीजी’ लिखा हुआ है। उस चित्र में एक लड़का
जैकेट पहने हुए है और उसके सिर पर गोल टोपी भी है, जिसे बाद में विश्व विख्यात गांधी
टोपी के नाम से जाना गया। उस बालक के माथे पर एक टीका और उसके गले में एक चेन है। इनके
अलावा कस्तूरबा गांधी की भी अनेक तस्वीरें हैं, जिनमें दोनों हंसी-मज़ाक करते हुए दिखाया
गया है। सन
1944 में गांधीजी को जेल से रिहा करने की याद में, पोरबंदर के लोगों ने हवेली के साथ
ही एक मंदिर का निर्माण किया। अब इस मंदिर को एक छोटे से संग्रहालय में परिवर्तित कर
दिया गया है। इसमें उन वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, जिनका उपयोग गांधीजी किया
करते थे तथा कुछ पुरानी तस्वीरें भी रखी गई हैं। इस संग्रहालय में एक पुस्तकालय भी
है, जिसमें उनके द्वारा लिखित अथवा उनके दर्शन व सिद्धांतों से संबंधित किताबें सहेजकर
रखी गई हैं। गांधीजी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए विश्व के अनेक महान नेता इस
मंदिर में जा चुके हैं। राजकोटगांधीजी
ने अपना सत्याग्रह आंदोलन आरंभ करने से पहले देश भर की यात्रा की थी। उन्होंने ये यात्राएं
रेल द्वारा की ताकि वह भारत के सामाजिक ताने-बाने को भली-भांति समझ सकें। जैसा कि उन्होंने
अपने मित्र, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले से वादा किया था,
गांधीजी ने स्वयं को ‘प्रोबेशन पीरियड‘ पर रखा और राजकोट से अपनी यात्रा आरंभ की, जहां
उन्हांेने दीवान के पुत्र के रूप में ‘सन 1881 से 1887 तक’ अपना बचपन बिताया था। उनका निवास
स्थान काबा गांधी नो डेलो, आज एक विशेष विरासत स्थल बन गया है। इस भवन में विद्यमान
छायाचित्रों से कोई भी महात्मा गांधी के जीवन से संबंधित घटनाओं की जानकारी प्राप्त
कर सकता है। इन चित्रों के नीचे हिंदी अथवा गुजराती में कैप्शन लिखे हुए हैं। यह भवन
सौराष्ट्रीय शैली में बना हुआ है तथा इसमें मेहराबादार द्वार व आंगन है। गांधीजी की
व्यक्तिगत वस्तुओं के प्रतिरूप तथा अन्य अनेक प्रकार की चीज़ें यहां पर रखी हुई हैं।
हथकरघा के प्रति गांधी के जुनून को यहां एक बुनाई स्कूल के रूप में प्रोत्साहित किया
गया है। इस स्कूल में युवा लड़कियों को सिलाई और कढ़ाई का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता
है। बनारस
‘वाराणसी’गांधीजी
के ‘प्रोबेशन पीरियड‘ की समाप्ति के बाद 1916 में उन्हें बनारस हिंदू
विश्वविद्यालय ‘बीएचयू’ की आधारशिला रखने के लिए वाराणसी बुलाया गया
था। ऐसा कहा जाता है कि उनके द्वारा दिए गए ओजस्वी भाषण ने भारत में उनके राजनीतिक
आंदोलन की शुरुआत का ही संकेत दिया था। उन्होंने
कहा था, ‘‘यह हमारे लिए बहुत अपमान और शर्म की बात है कि मैं इस शाम को इस महान काॅलेज
की छाया में, पवित्र शहर में, अपने देशवासियों को एक ऐसी भाषा में संबोधित करने के
लिए बाध्य हूं जो मेरे लिए एक विदेशी भाषा है।’’ जब
इस शांत शहर ने, जब उनके द्वारा बेधड़क होकर बोले गए ये शब्द सुने तब सभी को ऐसा प्रतीत
हुआ कि आंदोलन का आह्वान कर दिया गया है और एक बड़े नेता का आगमन हुआ है। वर्तमान
में, जब कोई इस विश्वविद्यालय परिसर में टहलता है तब किसी को भी गांधी की आभा का अहसास
हो सकता है।बाद
में, सन 1936 में गांधीजी ने इस शहर में प्रसिद्ध भवन - भारत माता मंदिर का उद्घाटन
किया, जो मील का पत्थर साबित हुआ। इस अनोखे मंदिर में किसी देवी-देवता की पूजा-अर्चना
नहीं की जाती अपितु भारत माता की स्तुति होती है। इसमें संगमरमर से बनी भारत माता की
एक प्रतिमा है, जो भारत की छवि का संकेत देती है। इससे यही आभास होता है कि भारत माता
सभी धर्मों को मानने वालों, नेताओं तथा स्वतंत्रता सेनानियों की देवी हैं। इसमें संगमरमर
से बना अखंड भारत का भौगोलिक मानचित्र भी है, जिसमें मैदानों, पर्वतों एवं समुद्र को
दिखाया गया है। अहमदाबादशांतिनिकेतन,
पश्चिम बंगाल में कुछ समय ठहरने के बाद, जहां पर वह नोबल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ
टैगोर से मिले थे, गांधीजी 1915 में सीधे अहमदाबाद गए। वहां पर उन्होंने साबरमती नदी
के किनारे पर सामुदायिक भवन का निर्माण किया, जिसका नाम साबरमती आश्रम रखा। यह आश्रम
अंग्रेज़ों के विरुद्ध उनके अहिंसावादी संघर्ष का मुख्य केंद्र हुआ करता था। यहां
पर आज भी उनकी आभा का प्रत्यक्ष आभास होता है और जो यहां पर घूमने आता है, उसे गांधीजी
की विचारधारा एवं उल्लेखनीय जीवन से रूबरू होने का सुअवसर मिलता है। उनके अहिंसावादी
संघर्ष से संबंधित दस्तावेज़ यहां पर विद्यमान हैं, साथ ही दांडी मार्च का भी उल्लेख
मिलता है जो गांधीजी ने साबरमती आश्रम से आरंभ किया था। ये सभी कुछ गांधी स्मारक संग्रहालय
में प्रदर्शित करके रखा गया है। यहां पर एक पुस्तकालय भी है, जिसमें गांधीजी द्वारा
लिखे गए पत्र रखे गए हैं, जो उन्होंने विभिन्न नेताओं को लिखे थे। इनमें से अधिकतर
पत्रों को लिखने के लिए रद्दी के काग़ज़ों का उपयोग किया गया था। इस आश्रम के निकट ही
हृदयकुंज स्थित है, जहां पर गांधीजी रहा करते थे। विनोबा-मीरा कुटीर, जो मेहमानों के
लिए था तथा यहां पर प्रार्थनाघर व एक भवन भी था, जिसका उपयोग कुटीर उद्योग के लिए प्रशिक्षण
हेतु किया जाता था। जब
आश्रम की स्थापना हुई तब तक गांधीजी ने धोती एवं पादुकाएं धारण करनी आरंभ कर दी थीं,
जो उनकी पहचान बन गई थीं, उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा को दरकिनार करते हुए निर्धन लोगों
के साथ घुल-मिलकर रहने के लिए ही इन्हें धारण किया था। जल्दी ही, उन्होंने कताई एवं
बुनाई सीख ली थी और खादी का उत्पादन आरंभ कर दिया था। खादी कातना एक अहम अभियान बन
गया। बाॅम्बे
‘मुंबई’गांधीजी
जिस क्षण भारत पहुंचे, लगभग छः राष्ट्रीय आंदोलनों के शुभारंभ के बाद, बाॅम्बे
1917 और 1934 के बीच उनकी अधिकांश गतिविधियों का केंद्र बना रहा। गांधीजी इस शहर में
स्थित मनी भवन में ही ठहरा करते थे, जो दो-मंज़िला इमारत थी। सन 1955 में विरासत की
धरोहर इस भवन को महात्मा गांधी के स्मारक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था जो भारत
की स्वतंत्रता की कहानी का इतिहास बयां करता है। उल्लेखनीय है कि, 1921 मंे महात्मा
गांधी ने चार दिवसीय उपवास यहीं पर रखा था ताकि मुंबई में शांति बनी रह सके। मनी भवन
में गांधीजी चरखे के साथ ठहरे थे और वह वहां पर खादी कातते थे। रोचक तथ्य यह है कि
सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह, स्वदेशी, खादी एवं खिलाफ़त जैसे आंदोलनों का आरंभ यहीं से
किया गया था। इस इमारत के बड़े बरामदों में घूमते हुए हमें उन राजनीतिक संघर्षों के
बारे में जानने को मिलेगा, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किए गए थे। इस संग्रहालय
के फोटो संभाग में सूचनाओं का भंडार व्याप्त है, जिससे भारतीय इतिहास की व्यापक जानकारी
मिलती है। पुणेसन
1942 में, जब ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ आंदोलन आरंभ किया गया तब गांधीजी एवं कस्तूरबा
को उनके सचिव महादेव देसाई के साथ पुणे के आगा ख़ान पैलेस में नज़रबंद कर दिया गया था।
इस महलनुमा हवेली का निर्माण सन 1892 में सुल्तान मोहम्मद शाह आगा ख़ान तृतीय ने करवाया
था। यही वह स्थान था, जहां पर दिल का दौरा पड़ने से बा ‘कस्तूरबा गांधी इसी नाम से प्रसिद्ध
थीं’ और
देसाई का निधन हो गया था। संगमरमर से बनीं उनकी प्रतिमाएं अब भी यहां पर बनी हुई हैं। वर्तमान
में, इस भव्य भवन में इतालवी वास्तुशिल्प तथा ऐसे बाग देखने को मिलते हैं, जिनमें मूर्तियां
लगी हुई हैं। अब यह गांधी राष्ट्रीय स्मारक सोसाइटी का मुख्यालय है। खादी, जो हाथ से
बना प्राकृतिक सूत होता है, जिसे महात्मा गांधी अपने चरखे से कातते थे, यह आज भी यहां
पर बनाई जाती है। 2.5 मीटर लंबा गोलाकार गलियारा जो बेहद प्रसिद्ध है, महल के चारों
ओर स्थित है। यहां पर अनेक छायाचित्र हैं जिनमें महात्मा गांधी और स्वतंत्रता संग्राम
से संबंधित अन्य नेताओं का चित्रण किया गया है। इनमें से सबसे प्रभावशाली चित्र वह
है, जिसमें गांधीजी को अंग्रेज़ों के विरुद्ध किए गए मार्च का नेतृत्व करते हुए दिखाया
गया है। आगंतुक यहां पर गांधीजी द्वारा किए गए कार्यों का भी अवलोकन कर सकते हैं, जो
उन्होंने सेवाग्राम में किया था। यह यहां से 8 किलोमीटर दूर वर्धा गांव में स्थित है।
इस महल की अन्य विशेषताओं में वह कक्ष भी है, जिसमें गांधीजी कस्तूरबा के साथ रहा करते
थे। उस कक्ष में उनका चरखा, पादुकाएं एवं अन्य वस्तुएं रखी हुई हैं। दिल्लीवह
जनवरी का सर्द दिन था। 78 वर्षीय महात्मा गांधी बिरला हाउस से चलकर उस बाग की ओर जा
रहे थे, जहां पर प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। वह अपनी दो भतीजियों के कंधों
का सहारा लेकर लोगों से मिल रहे थे। तभी एक व्यक्ति उनके करीब आया, जिसने नीली पेंट
एवं खाकी कमीज़ पहन रखी थी, उसने बापू का अभिनंदन किया। नमस्ते कहने के बाद उस व्यक्ति
ने पिस्तौल निकाली और बेहद करीब से गांधीजी पर तीन गोलियां दाग दीं। बाद में उसकी पहचान
नाथूराम गोडसे के रूप में हुई।गांधीजी
के निधन पर देश ने एक महान नेता को खो दिया था। उनकी एक भव्य समाधि देश की राजधानी
में राजघाट पर बनाई गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार 31 जनवरी,
1948 को यहीं पर किया गया था। आज भी लाखों लोग गांधीजी को श्रद्धांजलि देने यहां पर
आते हैं। यमुना नदी के किनारे पर स्थित राजघाट हरियाली से भरा हुआ है। इस लाॅन में
अनेक पेड़ लगे हुए हैं। गांधीजी की समाधि उनके सादे व्यक्तित्व को ही प्रतिबिंबित करती
हुई प्रतीत होती है। जहां उनके पार्थिव शरीर को अग्नि दी गई थी, वहां पर काले पत्थर
का एक बड़ा सा चबूतरा बनाया गया है। उसके चारों ओर संगमरमर की बाड़ लगाई गई है। इस पर
‘हे राम’ लिखा
हुआ है, जो उनके अंतिम शब्द थे। इसके साथ ही एक अखंड ज्योति जलती रहती है। इस मैदान
के आसपास जो वृक्ष लगे हैं वे किसी न किसी मशहूर हस्ती द्वारा लगाए गए हैं। इनमें महारानी
एलिज़ाबेथ द्वितीय, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहाॅवर, आॅस्ट्रेलिया के
पूर्व प्रधानमंत्री गफ़ वाइटमैन इत्यादि शामिल हैं। इन वृक्षों पर एक पट्टी लगी है जिन
पर इन नेताओं का नाम भी लिखा है। इस महान नेता को श्रद्धांजलि देने जाने से पहले आगंतुकों को जूते उतारने होते हैं। जिस दिन बापू का निधन हुआ था, उसकी याद में प्रत्येक शुक्रवार को एक अनुष्ठान किया जाता है। इसके निकट ही दो संग्रहालय भी स्थित हैं जो गांधीजी को समर्पित हैं।यद्यपियह दिन एक व्यक्ति के अंत को चिह्नित करने की दिशा में मनाया जाता है, किंतु यह एक